Tuesday, February 21, 2012

गुस्सा - वुस्सा


कितनी बार समझाया है तुमको २  बजे के बाद तुम्हारी खबर नहीं मिलती तो बेचैन हो उठती हूँ मै...सुबह से जाने कितने क़िस्से थे जों तुम्हे सुनाने थे, किचेन में कुछ नया ट्राई किया , विंडो शौपिंग वैगेरह वगैरह .......४.३० बज चुके है ...हर १५ मिनट पर रुक-रुक कॉल की और हर कॉल के बाद एक मेसेज .......पिछले १७ घंटो से तुम्हारी कोई खबर नही ......सच में बावरी हूँ मैं....कहीं सता तो नहीं रहे हमें .......बस इतनी सी खबर कर देते की ठीक हो काम में बिजी हो .....समझ जाती ना मै ......अब इतनी भी नासमझ नहीं ......तुम्हे  निगेटिव बातें पसंद नहीं .....डरते-डरते ही सही एक ख्याल का जन्म हो रहा है ...कहीं तुम  जान कर तो नहीं कर रहे  अवोइड मुझे .......मेरी लिए तुम्हारे मन में प्यार सच्चा  है ना.......या फिर तुम्हारी बातों में आ मै ही शिद्दत से चाहने लगी तुम्हे ......सच्चा- झूठा तो पता नहीं ....लेकिन हर लम्हा जिया है तुम्हारे साथ . मेरी जिंदगी की घडी तुम्हारी आहट की सुइयों से ही चलती है .....कहते है हर रिश्ते की एक हद होती है ......लेकिन तुम्हारे साथ रिश्ते में मैंने कोई हद ही नहीं देखी और ना रखी .......कभी कभी मेरे अन्दर की स्त्री चिढाती है मुझे ......लेकिन मुझे कोई अफ़सोस नहीं ....ख़त्म होने को तो एक पल में दुनिया ख़त्म हो सकती है .....दुनिया के ख़त्म होने का गम किसे है .....कुछ पल ही सही लम्हा-लम्हा जिंदगी जी है मैंने ......शान से खुदा के पास जाऊंगी के सबसे पाक और रूहानी काम इश्क करके आई हूँ......मुझे जन्नत नहीं चाहिए.....बस वो खुदा इतना अश्योर कर दें कि अभी ६ जन्मो और उसके बाद के ६ जन्मो ........तक तुम्हारे साथ इश्क क़ी दास्ताँ लिखूं......

Tuesday, October 11, 2011

मन का मौसम "बहारा"

दिमाग में अजीब सी हलचल है .....मजाल है जों एक पल के लिए शांत हो... जाने क्या क्या सोचता रहता है हरदम ........अगड़म-बगड़म, ऊँट-पटांग, सही-गलत, एक आंधी सी चलती रहती है  हर पल  ......सुना है हर आंधी सिर्फ धूल और गर्त लाती है .... हम भी ऐसा सोचते थे पहले,  जब तक नई आँधियों ने खुद को इंट्रोड्यूस नहीं किया था, आप लोग ना करो विश्वास लेकिन बात है सच्ची .... आंधियां लड़कियों जैसे बक-बक भी करती हैं और लडको जैसा सोचती भी हैं......मतलब ब्यूटी, बोल्डनेस, हार्डनेस, सोफ्टनेस और दबंगई का  कॉम्बिनेशन होती है ........ऐसी आँधियों को हमने नाम दिया है "बहारा"

मतलब....आने से  जिसके आये बहार :-) जैसे हरियाला सावन औ फुहारों वाली हवा ....तो हुई ना बहारा....जैसे मन यूँ ही मुस्कुराए, बुखार  में दवाइयां टेस्टी लगे...... जैसे गर्म सूप पीने से मुहं जल भी जाए लेकिन मोबाईल पर किसी विशेष ट्रिंग-ट्रिंग से मुहं में वेर्चुअल आइसक्रीम आ जाए .......विश्वास करो मेरा कुछ आँधियों में ऐसे एहसास होना आम बात है ........आँधियों में फूल भले ना खिलते हो लेकिन यकीनन किसी ना किसी के पास तो पहुचते हैं ...कुछ के बालों में यूँ ही टक जाया करते हैं ...तो कभी दुपट्टे से लिपट जाया करते हैं  .....लोग तो जान भी नहीं पाते के  कुछ पुन्ने-पुन्ने, नन्हे मुन्ने  जींस और शर्ट की जेबों में भी छुप  जाया करते :-) कुछ टुकड़े -टुकड़े हो बदन में उलझ जाया करते हैं  .कुछ सडको, सीढ़ियों, गैलरियों , खिडकियों, छतों और भी जाने कहाँ कहाँ बिखर जाते हो,,,,,सबकी अपनी-अपनी किस्मत. अपना नसीब .......कौन जाने कौन सी आँधी क्या क्या लाए ..सुना तो ये भी है की आँधियों के भी प्रकार होते हैं .....लाल आँधी, काली आँधी और पीली आँधी... इसे फिजिकल या विजिबल आंधी भी कह सकते हैं.....लेकिन भावनात्मक आँधियों के बहाव की तीव्रता को मापने का पैमाना कोई नहीं...वो तो मन की गति से चलती है...जीवन की लहरों पर......दुआ करती हूँ मन की आंधियां कभी उदास ना हो....फिलहाल तो मन का मौसम खुश है तो अंदर की आंधियां है - स्मार्ट आंधी, ब्यूटीफुल चार्मिंग और बिंदास आंधी  ......सो अबकी बार आँधी आए ना तो खिड़कियाँ दरवाजे मत बंद करना.....ये सोच कर की धूल धक्कड़ आएगे.......

जाने किसने आँधी की इमेज खराब कर रखी है सोसाइटी में .....हमेशा आँधी शब्द को  नेगेटिव सेन्स में सोचा, समझा, माना, सुना और जाना जाता है  ......जैसे आँधी ना हो गई,......कैकेई मंथरा और दुशासन हो गई ........आँधी ऐश्वर्या, दीपिका, रणवीर,  ईद, दीवाली होली और गुलाबजामुन भी हो सकती है......आँधी खुसबू भी लेकर आती है और धानी रंग चुनर भी .....प्यार से देखो उसको तो सोंधा सा एहसास भी ....आत्मविश्वास से कही गई बात है मेरी......आप लोगों को लगेगा बकवासबाजी कर रही है लड़की  .....महसूस करके ही बताती हूँ हर बात क्योंकि....... ऐसी ही एक बहारों वाली आंधी ने मेरी ओर भी किया है रुख ...पता है! हम क्या चाहते हैं के ऐसे खुश मिज़ाज और खूबसूरत आँधी हर इंसान की ज़िंदगी में आए.....ताकि आने वाले नस्ले आँधी के नये रूप को जान सके और .....वक़्त की करवट के साथ नकारात्मक सोच का टैग भी आँधियों के नसीब से गायब हो जाए......लोग आँधियों से डरे नही ......बल्कि प्यारा नज़रिया रखे.....और जमाना कह उठे .......हाँ  आँधियों के सीनो में भी दिल होता है

Saturday, April 23, 2011

मन की बात,जों लफ्ज़ ना बनी

जब कभी तुम्हारी कोई बात अच्छी लगती है....दिल चाहता है कह दूं के तुमसे प्यार है ,लेकिन फिर सोचती हूँ तुम ऑदरवाइज लोगे....वैसा वाला प्यार नहीं ...वो वाला प्यार जों किसी की भी प्यारी बात सुन आपको प्यार करने के लिए मजबूर कर दें......जैसे कोई कुछ पल के लिए आपकी रूह को छू लें .....हमें  बहुत बुरा लगता है जब प्यार जेंडर में बंध जाता है ....इसका ये मतलब ना निकला जाए के हम होमो सेक्सुअलिटी का समर्थन कर रहे हैं.....हमारा उन बातों से  कोई कंसर्न नहीं .....

हमें ना तुम पर बहुत गुस्सा भी आता है जब तुम मेरी बक बक सुनकर भी रेअक्ट नहीं करते ......अजीब इंसान हो...लाइलाज मुद्दों पर बहस करते हो...ढंग के कामो में तो जरा भी मन नहीं लगता तुम्हारा ...       सच में फुर्सत से बनाया है खुदा ने तुम्हे..... और बना कर वो सांचा भी तोड़ दिया ....ताकि तुम्हारे जैसा कोई दूसरा पीस ना निकले.....खैर! हमें क्या .... हमको आदत है बोलने की .....पूरी बातें कहने की ,चाहे कोई सुने ना सुने .....हम तो बोलेंगे और वैसे भी आजकल थोडा तो कम ही बोलने लगे हैं


वो पिछली बार कसम खाई थी ....अब तुमसे बात नहीं करेंगे....लेकिन फिर वही तुमने जरा सा कुछ कह दिया और हम शुरू हो गए नोन-स्टॉप....मेरे गुस्से की तो पूछो ही मत .....जब गुस्सा आता है तो जी चाहता है के खींच के दो-चार चपाट रसीद कर दूं.....या फिर खाने में ढेर सारी मिर्च खिला दूं. या फिर गाडी ठोंक दूं ...लेकिन उससे क्या होगा ...आफ्टरआल वो तकलीफ भी हमें ही सहनी पड़ेगी...और गिल्ट फीलिंग का शिकार होंगे, वो  अलग |


पता  है ! तुम्हारी समझदारी की बातें सुनकर कभी तुम हमें अपने पापा जैसे लगते हो, और जब बुद्धू जैसे हरकते करते हो तो कोई छोटे बच्चे जैसे.....और जब ज्यादा इंटेलिजेंट बनने की  कोशिश  करते  हो  तो  भईया जैसे ...जब डिस्कशन, फन  या  सिरियस - नोर्मल बात करते हो तो दोस्त जैसे ....मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार भी है, गुस्सा भी है,सम्मान भी है लेकिन माइंड इट इसमें लवर्स  के जैसे  कोई लक्षण नहीं है ....सो खुशफहमी नहीं होनी चाहिए ...वैसे तुम सारे सहज व्यवहारों में भी असहज क्यों हो जाते हो? और हाँ! ये उलटे -सीधे मतलब निकलने की तो बहुत बुरी आदत है तुम में...आगे भी बताते रहेंगे...अभी थोड़ी जल्दी है सो निकलते हैं:-)    तुम सोचो- सोचो :-) 





Saturday, March 5, 2011

मेरी वाली शामें



अरसा हुआ सांझ से मुलाकात नहीं हुई. व्यस्ततता ज्यादा नहीं है फिर भी व्यस्त हूँ कहाँ ? मेरा जवाब होगा मालूम नहीं. मेरे और उसके रिश्ते में फर्क तो आया है लेकिन हमारे बीच कोई शिकवा नहीं....हम दोनों जानते हैं जब फुर्सत की फुर्सत में मिलेंगे तो वक्त झरने के जैसे बह जाएगा और धारा को एहसास भी नहीं होगा कि सफ़र कितना हो चला है. 

याद तो होगा ना साँझ तुम्हे ......बात उन दिनों कि है जब हम बारहवी में थे, बोर्ड की परीक्षा देने के बाद वो गर्मियों की छुट्टियाँ हर रोज तुम्हारे इंतज़ार में ही तो कटती थी...वो तपती दोपहरी...माँ के कहने से टाल-मटोल कर छत से कपडे लेने जानबूझकर  नंगे  पैर जाती ताकि दे सकूं धूप को हज़ार उलाहने....लेकिन वो ढीट, बेशर्म धूप उलाहनो, तानो... किसी से भी ना बाज आती...करती रहती मनमानी ....हमसे उसकी जलन का नतीजा पांवो की तपन......पूरी दोपहर कैरम, लूडो, शतरंज, भैया से लड़ाई, आचार और मिठाई के चुराई में बीतती. उफ्फ्फ कितना खाते थे हम उन दिनों . 

फिर घडी चार बजाती....आँगन तक आई धूप बरामदे में जाती और तेरे आने से खुश हो हम कितना काम कर जाते...वो सारे पौधों को पानी पिलाना....कुछ तो इतने प्यासे होते के गट-गट कर बुल्ला भी छोड़ते....और हम फूँक मार बुल्ले को तोड़ते...दीदी चाय बनाती थी....और मेरे फेवरेट चावल की कचरी भूनती .....इधर पाइप लगा जब हम मिट्टी को सीचते तो सौंधी खूसबू मेरे रोम-रोम में समां जाती....कितनी बार तो लालच में मिट्टी भी चखी है हमने ......फिर दीदी की आवाज़ "कचरी खालो आके, वरना बाद में झगडा करोगी "

बाहर आ जब देखती तो तुम पूरी तरह सज-संवर उतर चुकी होते मेरी कालोनी ....और वो सूरज...लाल,पीली, काली सफ़ेद धुआं -नुमा निशानी छोड़ अपना बोरिया-बिस्तर उठा दूर देस जाने की तैयारी करता. 

याद है तुम्हे मेरा उन दिनों बैडमिन्टन का चस्का!  कल्पना, ज्योति, राजू, विपुल ....और भी ना जाने कितने सारे...कुछ के तो नाम भी भूल चुके हैं हम ...यूँ तुम्हारी मौजूदगी में खेल और दोस्तों का साथ कितना भाता था हमें ....कितने दिन हुए...तुम आती तो रोज हो बस मुलाकात नहीं हो पाती....वो सीन नहीं दोहरा पाते हम....खेलने  के  बाद  भी  कहाँ  छोड़  पाती  थी  तुमको....चढ़ जाती अटारी और सीढ़ी वाले पिलर के पास कभी बैठ के, तो कभी खड़े होके करती मुआयना चिड़ियों के लौटते हुए झुंडो का .....लहराती पतंगों का और वो रंग, बिरंगे बादल.. जों फुसला कर सूरज को एक सुनहरी रेखा में कर देते ट्रांसफोर्म....इस मंज़र में तुम्हारा साथ कितना सुकूँ देता था हमें .....


फिर चाँद होने लगता बेपर्दा....बादलों के घूंघट से ...धीरे-धीरे तारे झांकते और शुरू हो जाता पूरे आकाश पे कब्जे का सिलसिला....और आ जाता रुखसती का वक़्त ....मुस्कुरा के तुम्हे विदाई दे भी नहीं पाती कि माँ कि आवाज़ " छत पर ही टँगी रहना, एक जगह पैर नहीं टिकते तुम्हारे....माँ की आवाज़ सुनते ही तेजी से सीढ़ियों की तरफ भागती ..तुम्हे टा-टा  कहते हुए....नीचे वही ट्यूबलाइट की रौशनी में चूरा होती सांझ.....गोधूली की बेला की दास्ताँ क्यों नहीं हो सकती? 


यूँ तो साँझ अब भी आती है ....लेकिन मेरी वाली नहीं आती ....आज तुम्हे याद तो बहुत किया...लेकिन गुजरे वक़्त को वापस पाना नहीं चाहती ....यादों में रहो इतना काफी है....

मिलने की चाह तो बलवती है आज भी....लेकिन तब, जब रूमानी बरसातें मेरे आस-पास मंडराएं और कोई फूलों से महका दें मेरी मन की हर क्यारी.....तब आना तुम वक़्त को रोक कर, सोंधी हवा के साथ, मदमस्त गीत गाते हुए...किवाड़ बंद कर देंगे हम ...जाने ना देंगे तुम्हे ...इतना एकांत भी अच्छा नहीं होता, आखिरकार कोई तो हो साक्षी मेरी उमंग, तरंग, ख्वाब, ख्याल और ख्वाइशो का




              जहाँ-तहां पड़े रहते हैं यादो के इन्वेस्टमेंट
             सपनो के शेयर, ख्यालों के म्युचुअल फंड

               जिन्दगी स्टॉक एक्सचेंज नहीं है तो क्या है?




Friday, February 4, 2011

तोहफा

मैं तुम्हे कोई तोहफा देना चाहती हूँ. वो जों दुनिया जहान में मुझे सबसे प्यारा हो, निराला हो अद्भुत हो, मुझसे ऐसा जुड़ा हो जैसे हवा और साँसे, नदी और किनारे, गृह-नक्षत्र और बारह रशिया, समंदर और शार्क,  बर्फ और ख़ामोशी, तुम-हम और हम तुम  ......अब तुम्ही को तुम्हे दूँगी तो अच्छा तो ना लगेगा ना ...भला ये भी कोई भेट हुई......कोई बाजारू  आइटम ... वो तो कोई भी किसी को भी दे सकता है....कल मार्केट में कोई नया ब्रांड आएगा और वो पुराने गिफ्ट आइटम को किक कर नए रैपर में गुरूर से सटक जायेगा...तो क्या दूं ? कोई ऐसी भेट जों अनमोल हो, मानसिक, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक रूप से सिर्फ मेरी....जिस से सिर्फ सिर्फ और सिर्फ मेरी रूह झलकती हो .....
अरे हाँ! मिल गया तोहफा  तुम्हारे लिए ....जानते हो! जब मै लिखती हूँ तो मै, मै कहाँ रहती हूँ ....ना जाने कितने किरदार समां जाते है मुझमे....मैं लफ्ज़- लफ्ज़ जीती हूँ, हर्फ़ हो जाती हूँ,अल्फाज़ गिरते जाते है...चुनती जाती हूँ उन्हें दामन में....चोट ना लगे, दर्द ना हो तो इस वास्ते अलग -अलग मूड का मलहम लगाती हूँ ...और क्या बताऊँ.....एटीट्युड का इंजेक्शन भी ठोका है मैंने .....  ये सब कैसे होता है मुझे नहीं पता....ये मेरे सारी नज्मे उन क्षणों की उपलब्धि है जब मैं खुद में नहीं रहती .....अमूर्त हो जाती हूँ, कितनी बार तो मैंने तुमसे कहा है कि मेरे अन्दर सैकड़ो लोग रहते हैं....इसीलिए मैं जिन्दा हूँ... मुझे नहीं पता किस मानसिक अवस्था में मै ये सारी बातें कह रही हूँ....लेकिन जब जब मैं इन किरदारों को जीती हूँ तो लगता है मै शुचिता हूँ गंगा सी नहीं...इंसान सी या स्त्री सी भी कह सकते हो ....मै चाह कर भी अपने अन्दर से इन लोगों को नहीं निकाल पाती...इनका मेरे साथ रूह का रिश्ता है ...शगुफ्ता दिखती हूँ इनके खातिर....एक बात बताऊँ....तुम खुद को भी पाओगे इनमें....बेइरादा ही सही ....लेकिन तुमको भी जिया है मैंने

तो लो ये पुलिंदा मेरी कच्ची, अधकच्ची, पक्की, झुलसी, सिमटी, शरमाई, सकुचाई, अल्हड़, लड़कपन, जवान, बुजुर्ग, हंसती, गाती, सोई- जागी सी  तहरीरो का....अब ज्यादा बखान ना होगा मुझसे.

यही मेरे जीवन भर की पूँजी है ....तुम्हे मेरा ये तोहफा तो कुबूल होगा ना...तुम चाहो तो जला सकते हो, एक-एक नज़्म, रचना, मेरे किरदार. फिर उसकी राख को डिबिया में रख बच्चो को काला टीका लगाना, ताकि फिर बच सकें नज्में बुरी नज़रों से और जन्म ले सकें नई नज्में .

तुम जों अभी तक मुझे मिले ही नहीं....इंतज़ार कर रही हूँ कबसे...मेरी जीवन-यात्रा में आने वाले मेरे मुख्य किरदार मैं तुमसे ये सब कहना चाहती हूँ . तुम सब कुछ करना पर लिखने के लिए कभी मत टोकना .....मैं चाहूँ तो जन्मो ना लिखूं, मै चाहूं तो हर सांस लिखूं....


Monday, November 15, 2010

घर /मकाँ/ जुमले/लड़कियां

लोग क्या कुछ नहीं करते...एक आशियाँ बनाने के लिए .....बन भी गया तो सजाने के लिए......कितने अरमान होते हैं एक घर के साथ....और उस घर से जुड़े हर पल के साथ .....उन दीवारों ने क्या कुछ नहीं देखा होता....साक्षी होती हैं तब भी, जब घर में कोई नहीं होता ....हर दीवार की एक कहानी होती है,सीनरी, कैलेण्डर, बाल हैंगिग और रंगों की परते, रंग बदलती इंसानी फितरतों सी तजुर्बेकार.....फिर क्यों कहते हैं दीवारें निर्जीव होती हैं? हर्षो-उल्लास, प्रेम, गम, दुःख,पीड़ा, अवसाद, ना जाने कितनी भाव-भंगिमाएँ, सैकड़ो मुद्राए सभी में कभी हमसफ़र तो कभी हमनवा....लेकिन उन पर भी उसका हक नहीं होता .......पराई अमानत जों होती हैं .....फिर एक दिन इन दीवारों से भी नाता टूट जाता है.....दूसरा पराया घर, अपने-पराये से लोग और जान - पहचान बढाती दीवारें ......इन दीवारों से मकाँ बनता है और स्त्रियों से घर .....ख़ास तौर से बेटियाँ .....हाँ !जिन्हें घर की रौनक कहा जाता है ....टिपिकल भारतीय परिवेश की बात करूँ तो ओवर- प्रोटेक्ट किया जाता है



हिन्दुस्तान की शायद ही कोई ऐसी लड़की हो जिसने "पराई अमानत" जैसा जुमला ना सुना हो ......यहाँ मेरे हिसाब से रहो जब अपने घर जाना तो जैसा चाहना वैसा करना ..... जिसे घर मान एक उम्र बिताती है, घर को सवारती हैं सजाती है...उसे मालूम होता है घर के हर हिस्से के जज़्बात ....लुका-छिपी के खेल में कौन सा कोना उसका फेवरेट था, मिकी-माउस और शक्तिमान के स्टीकर उसकी वार्डरोब में आराम से रहते हैं...और वो आइना जों तब ही साथ था जब वो शमीज़ पहन पूरे घर में दौड़ती और फिर आईने के सामने आ तरह-तरह की शक्ले बनाती .....इसी आईने ने उसे साडी में भी देखा है .....गमले में लगे वो सारे पौधे वाकिफ हैं उसकी छुअन से है ...जब टहलते-टहलते तुलसी के पास जाती...तो तुलसी आपने आप झुक जाती कि चख ले मेरी पत्तियां.....कई बार तो हवा के बहाने से गिरा देती अपनी शाखे ...माँ सी तुलसी.....जानती है कि उसे स्वाद पसंद है ....सो खामोश से कर देती बलिदान......फिर धीरे- धीरे लड़कियां खुद ही समझ जाती ....कि एक दिन उन्हें जाना होगा...दूसरे लोगों के बीच सबकुछ छोड़ कर.....उन्हें भी इंतज़ार होता अपने हिस्से कि ज़मीं और अपने आसमां का .....और फिर वो दिन आता जब उसे अपना घर संसार मिल जाता ......उसके हिस्से का आकाश .......उसका अपना घर जहाँ से उसे किसी पराये घर नहीं जाना .....लेकिन मरे जुमले यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ते ......ये रस्म तुम्हारे घर होती होगी, हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता .......या फिर कुछ यूँ ..... जब अपने घर जाना (मायके) तभी फलाना काम कर लेना.


अब लड़की कन्फ्युस आखिर उसका असल घर कौन है .....क्योंकि माता -पिता के यहाँ तो वो पराई-अमानत थी .....अब जब उसे अमानत कि सुपुर्दगी उसके मालिक को कर दी गई है फिर भी ये घर वाले जुमले ...हमें लगता है की लड़कियां एक प्रोपर्टी के जैसे होती हैं जिन्हें ट्रान्सफर किया जाता ....उनकी ओनरशिप बदलती है बस .....लेकिन फिर सवाल जगा एक .......अगर प्रोपटी हैं तो ट्रांस्फ्री को कीमत क्यों चुकानी पड़ती हैं? ये पेचीदा मसले है ....रस्मो, रिवाजो, परम्परों और प्रथाओं से जुड़े हुए .....इन्ही को कहते हैं संस्कृति शायद .....सवाल तो अब भी वही टिका है....हिला ही नहीं....हमसे पहले की पीढ़ी ने भी पूछे होंगे शायद, अगली पीढ़ी के पास जवाब हो शायद....इसी उम्मीद के साथ ......फिर कभी मिलते हैं


Friday, September 10, 2010

डिप्लोमा -ए-जज़्बात (स्पेशलाईजेशन इन इनकम्प्लीट कम्युनिकेशन)

उसका मूड नहीं है आज लिखने का......फिर भी लिख रही है....क्यों ? वो खुद नहीं जानती ...जब भी कोई एकअचानक से याद आता है उसे... तो वो बहुत ज्यादा काम करती है या फिर घर वालों और ऑफिस वालों परखीझती है बेवजह पूरे दिन इरिटेट रहती हैं, या फिर बहुत ज्यादा खाती है और अगर इनमें से कुछ नहीं कर पाती, तो लिखती है न जाने क्या- क्या ....अनाप-शनाप





अब कागज़- कलम का ज़माना तो रहा नहीं सो कीबोर्ड पर उँगलियाँ घिसती है......लेकिन उस जहनगर * को लेकर आज तक कोई मुक्कमल नज़्म, गीत, कहानी, लेख ना मिसरा और ना अंतरा कुछ भी तो नहीं लिख पाई वो . कितना अजीब है ना... और ताज्जुब भरा भी जिसको लेकर एक हर्फ़ भी नहीं फूटा उसकी लेखनी से ......वो उसके दिमाग में घरौंदा बना बैठा है वो जिसका ख्याल उसकी रूटीन लाइफ को प्रभावित कर जाता है .......एक अक्षर भी ना भेट किया उसको ...लैक ऑफ़ कम्युनिकेशन की शिकार....बेचारी! नहीं-नहीं बेचारी टाइप मटिरियल नहीं वो.



रिजिट हुआ करती थी वो उन दिनों ......क्यों बदलूँ मैं .....जैसी हूँ वैसी ही रहूंगी ....मुझे कोई नहीं बदलसकता.....जाने क्यों लोग किसी की लाइफ में इम्पोर्टेंट बन जाते हैं और ना जाने क्या - क्या. हम तो बिनापरमिशन किसी को दिल में इंट्री ही नहीं देंगे.....जाने कैसे लोगों का खुद पर इख्तियार नहीं रहता .....इमोशनलफूल कहीं के.


ताज्जुब होता है उसे ....बिना दास्ताँ के इस अफ़साने पर .....कम्लीट कम्युनिकेशन का फ़ॉर्मूला वो अच्छी तरह जानती है ....बस इम्प्लीमेंट नहीं किया भारत सरकार के कानूनों के जैसे.....यहाँ तो बगैर कम्युनिकेशन के रिश्तेदारी लग गई.....ये सब कब कैसे हुआ उसे पता ही नहीं......प्रक्टिकल टर्म में विश्वास करने वाली बंदी कब इमोशनल हो गई....खुदाई साजिश का नतीजा था ये सारा......या फिर सो काल्ड खुदा कुछ सीखाना चाह रहा हो .....साइलेंट कोम्युनिकाशन के स्लेबस में जिंदगी कौन सी नई परिभाषा सिखा गई ....उसका इल्म तो उसे इन बदलते एहसासों का डिप्लोमा करने के दौरान क्या रिजल्ट घोषित होने के बाद हुआ.....खुल कर रो भी नहीं सकी वो.....खुद को ही कोसती रही ....आज भी कोसती है ...अरमानो को क्यों मचलने दिया ?


ना किसी ने कुछ कहा.....ना किसी ने कुछ सुना ....ना कुछ खोया और ना ही कुछ पाया ......फिर भी कितना कुछ हैउसके पास ....चंद लम्हे ....कुछ फनी इ-मेल्स....मोटिवेशनल थॉट्स, फेस्टिवल ग्रीटिंग्स .....पुरानी डायरी के किसी कोने में लिखा एक मोबाइल नंबर जों अब एक्सिस्ट नहीं करता है .....एक अल्हड़ बावरी गुस्से वाली को सोफ्ट और मच्योर में बदल चल दिए जनाब ....और जाते भी क्यों नहीं ...उन्हें कुछ पता ही नहीं था कि किसी के दिमाग में ऐसे फिट है कि ताला भी वही और चाभी भी वही .


गलत जगह बिना किसी की राय के जज़्बातों को इन्वेस्ट किया ....फंड की मच्युरीटी तो दूर , कोई सरेंडर वैल्यू भी नहीं मिली .......लेकिन इंटेरेस्ट का भुगतान आज भी चल रहा है ....... जज़्बातों पर भी चक्रव्रधि ब्याज लगता है क्या ? ब्रोकर भी नहीं जानता था कि प्रोस्पेक्ट क्या चाहता था.


दोस्त बोले ये तो दास्ताने इश्क का आगाज़ था .....लेकिन वो आज भी नहीं मानती कि उसको कभी मोहब्बत हुई थी उसे नीले छतरी वाले से नहीं बनती उसकी .....अनबन चलती रहती है .....ये दर्द टीसता है उसको ...इसके साथजीना आदत का हिस्सा . फिर सोच पनपती है ज़िदगी ऐसी ना होती वैसी होती तो कैसी होती ? काश ! कम्युनिकेशन कम्प्लीट हुआ होता ? ...

खैर एक शेर गुगुनाते अक्सर देखा है मैंने उसे ---
"दे गया है जों तजुर्बा अपने सफ़र का है मुझे

हो ना हो उस रहनुमा से वास्ता कोई तो है "
(नहीं जानती किसकी कलम से निकला हुआ सच है )





{जहनगर * - मेरे हिसाब से जहन में रहने वाला (ना जाने किसी शब्दकोष में ये शब्द है कि नहीं ....लेकिन हमलिखेंगे हमारा मन है अगर नहीं शब्द है तो मेरे शब्दकोष का नया शब्द माना जाये)}